अतीत में खोई हुई प्रतिक्रिया

जब देखता हूं

नंगे भूखे बच्चों को

सड़को के किनारे

दो रोटी मांगते

अपने माता पिता 

भाई बहनों को

लाशों के ढेर में ढूंढते

मुझे दुख होता है।

जब अबलाओ की

सरे आम

इज्जत लुटती है

और बेदर्दी से उन्हें

मौत के घाट 

उतारा जाता है

मुझे दुख होता है।

मुझे दुख होता है 

अपने मानव होने पर

जो स्वार्थ परता से 

अन्धा हो गया है

 भूल गया है

मानवता क्या है

जब मुझे याद आते हैं

वे दिन रुह कांप उठती है

देश हुआ था विभाजित

बंग हुआ था भंग 

और उन्होंने 

कतले आम मचाया था

अबलाओ की इज्जत लूटी थी

लाशो के ढेर लगाये थे 

पर बालक

माता पिता को

ढुढने के लिए 

जिन्दा न थे

आज इनको रोते देखकर 

मुझे दुःख होता है

पर ईश्वर के न्याय में 

आस्था हो गयी है। 

                       By  Prem Sukh Marothi

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