पता नहीं क्यों..

.. • ...पता नही क्यों.....

आँखों में आज नमी सी है 

पता नही क्यों 

पर ज़िन्दगी मिली जुली सी है।

एक डाल गिरी ज़मीन पर 

कुछ निशान छोड़ गई 

पर मेरी चाहत दबी दबी सी है ।

कभी ख़्याल आता है तोड़ दूँ                  

इस बेबसी को ,रोलुं

पर ज़िन्दगी मेरी भली भली सी है।

वो दोस्त मेरा था 

आलम पर आलम था 

पर पता नही क्यों 

पता नहीं 

ज़िन्दगी मेरी मुफ़लिसी है।

नदी के हल चल सा 

चाहतों का सिलसिला रहा 

उसमें उठा

उठा एक बावण्डर भी था

फिर भी हाँ,

फिर भी 

ज़िन्दगी में बेबसी सी है।