शायरी

तु मौसम में घटा बन जाऊं।।

तू कहे तो फिजा बन जाऊं।

पेड़ की घनी छाया में ।

तुझको अपना राही बनाऊं।

हवा का ऐसा रुख़ में   

ऊड़ु  तुझको उड़ा ले जाऊं।

 

 

 

इल्तिज़ा की महबूब से मिलने की,

अरमान जगाये मोहब्बत प्यार के।

पर कम्बख्त घड़ियां ही बीत  गई,

महबूब के इंतजार में।।