ईश्वर

ईश्वर! क्या है???

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ये रास्ते उसके किनारे,

देखा उस झोपड़ी में।

जो पक्की थी कुछ कच्ची

मैंने तो पाया उसे अन्नदान में।।

बच्चों की आशा बनके,

दीदार किया उसी सुकून में।

मुस्कान बनके जो उतरा,

मेरे ही अपने हाल में।।

दरिया आया पानी बहाया,

डूबा जो उसी काल में।

दया का जो भाव उमड़ा मेरे ही अन्तरमान में।।।

ये तो जो वहीं खड़ा, तेरी ही हंसती छांव में।

तुझी ने बनाया तुझी ने पाला,

मिला तेरे ही अवसाद में।।

यह तो है एक आस्था,

विश्वास उस चरम बिन्दु मे।

मैंने तो पाया उसे बनाया, पुण्य के प्रकाश में।।